“मोहजितविजयजी ज्ञानदान करते करते कहलाए पंडित महाराज।”

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■ मुनिप्रवरश्री की 25वीं पुण्यतिथि पर गुणानुवाद संपन्न, चार पुस्तकों का भी विमोचन.

मुंबई वार्ता/संजय जोशी

शिष्य के हृदय में गुरु स्थान प्राप्त करे वह साधना है लेकिन गुरु के हृदय में शिष्य बस जाए वह सिद्धि है। यह बात आचार्यश्री अरिहंतसागरसूरिजी मसा. ने यहां श्री वासुपूज्य मुनिसुव्रतस्वामी जैन संघ, माधवनगर के तत्वावधान में आयोजित मुनिप्रवरश्री मोहजितविजयजी मसा. की 25वीं पुण्यतिथि के उपलक्ष में गुणानुवाद सभा के दौरान कही।

उनके जीवन का परिचय देते हुए आचार्यश्री ने कहा कि विरासत में ही धर्म के संस्कार मिलने के कारण उनकी परवरिश एक धर्ममय वातावरण में हुई। उनकी असाधारण प्रतिभा को देखकर उनके गुरु आचार्यश्री रामचंद्रसूरिजी ने प्राथमिक अभ्यास के बाद जैन दर्शन तथा षड्दर्शन का उच्च अभ्यास करने के लिए उन्हें काशी स्थित बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय भेजा। वहां के तत्कालीन उपकुलपति बद्रीनाथ शुक्ल की निगरानी में मुनिप्रवर ने ग्यारह वर्षों का पाठ्यक्रम मात्र दो वर्षो में पूर्ण कर जैन शास्त्रों तथा न्याय के ग्रंथों के रहस्य उजागर करना शुरू किया।

इतनी छोटी उम्र में विद्वत्ता एवं योग्यता हासिल कर उन्होंने नि:स्वार्थ भाव से जैन संघ के अनेक समुदायों के आचार्यों एवं साधु-साध्वी भगवतों को ज्ञानदान करना शुरु किया। घंटों तक अध्ययन-अध्यापन प्रवृत्ति में लीन होने के कारण जैन संघ में उन्हें ‘पंडित’ के उपनाम से बुलाया जाने लगा और दीक्षा के बाद वे पंडित महाराज के रूप में जाने गए। वे न सिर्फ जैन दर्शन और षड्दर्शन के ज्ञाता थे बल्कि अंतर्राष्ट्रीय राजनीति, अर्थतंत्र, विश्व इतिहास, जीव विज्ञान, कॉस्मोलॉजी आदि अनेक विषयों पर उन्होंने महारथ हासिल की थी। जनसंपर्क से कोसों दूर वे हमेशा अपनी साधना में मस्त रहते थे।

उनके मार्मिक व तार्किक प्रवचन ने मुम्बई व अहमदाबाद जैसे शहरों में वैचारिक क्रांति लाई। जीवन के अंत तक वे जिनेश्वर के वचनों और शास्त्र के सिद्धांतों के प्रति वफादार रहे। अंत समय में भी अत्यंत शारीरिक वेदना के बीच भी वे मानसिक रूप से ज़रा सा भी अस्वस्थ नहीं दिखाई दिए और उन्होनें समाधि मरण प्राप्त किया। तत्कालीन जाने माने अर्थशास्त्री और अधिवक्ता नानी पालखीवाला समेत दिग्गज राजनेता, धर्मगुरु और सामाजिक हस्तियाँ उनकी विद्वत्ता व सादगी से प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकी। लंदन के तत्कालीन प्रिंस के अनुरोध पर समस्त जैन संघ में सर्वमान्य ग्रंथ-तत्त्वार्थ सूत्र के किये गये अनुवाद के संपादन की जिम्मेदारी भी जैन संघ के तत्कालीन अग्रणियों ने मुनिश्री की विद्वत्ता को ध्यान में रखते हुए उन्हें सौंपी थी।

इससे पूर्व मुनिप्रवरश्री मोहजितविजयजी की प्रतिकृति के समक्ष दीप प्रज्वलन, गुरुभक्ति गीत व गुरुवंदन से कार्यक्रम की शुरुआत हुई। अध्यक्ष मोहनलाल शाह ने सभी का स्वागत किया। सचिव प्रकाश पिरगल ने बताया कि 15 अगस्त को संघ में चल रहे समेतशिखर तप की पूर्णाहुति के उपलक्ष्य में तीर्थ की भावयात्रा का आयोजन किया गया है।पूज्यश्री के प्रवचन की 4 पुस्तकों का विमोचन किया गया। गौतम शाह ने गुरुभक्ति गीत प्रस्तुत किया।

23 नवंबर को होने वाली दीक्षा के उपलक्ष में मुमुक्षु भव्य शाह के माता पिता का संघ की ओर से बहुमान किया गया। कार्यक्रम के लाभार्थी कल्याण मित्र परिवार एवं गुरुभक्त परिवार ने व्यवस्था संभाली।

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