प्रोफेसर शांतिश्री धुलीपुड़ी पंडित( कुलगुरू /जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय/ दिल्ली)/ स्तंभकार/मुंबई वार्ता

“दुर्भाग्य यह है कि सबसे अधिक सहिष्णुता का दावा करने वाले अब असहिष्णु हो गए हैं। जो लोग समावेश का समर्थन करते हैं, वे ही अब बहिष्कार कर रहे हैं।”वोक शाब्द अफ्रीकी अमेरिकी अंग्रेजी से आया है, जिसका मतलब थे किसी भी नस्लीय पूर्वाग्रह के प्रति सतर्क रहना। इसका तबसे निरंतर विस्तार होता रहा है। किन्तु भारत में इसकी आड़ में देश और समाज विरोधी कार्य किया जाने लगा है।


■ फिर एक चिर परिचित दृश्य का सप्ताह:
इंडिया गेट पर वायु प्रदूषण के लिए प्रचारित एक “नौटंकी” अभियान, लेकिन पर्दे के पीछे वही जागरूकता का दिखावा किया गया। दिल्ली की एक अदालत को कई कथित “पर्यावरण कार्यकर्ताओं” को हिरासत में भेजना पड़ा, जब जांचकर्ताओं ने उनके और प्रतिबंधित माओवादी संगठन के लिंक पाए, साथ ही वीडियो ने इन्हें लंबे समय से नक्सली संगठन से जुड़े नेटवर्क से जोड़ा।


वायु प्रदूषण विरोध की यह झूठी प्रस्तुति दिल्ली में धुंध की बात कभी नहीं थी, बल्कि एक खतरनाक प्रवृत्ति का प्रतिबिंब थी, जिसमें दुर्भावनापूर्ण तत्व एक नागरिक आंदोलन के भेष में आपराधिक एजेंडे का समर्थन करते हुए सुहानुभूति भी पाने की कोशिश कर रहे थे।अगर प्रदूषण उनके असली चिंता का विषय होता, तो इस भीड़ को तब क्यों नहीं दिखा, जब दिल्ली में वायु गुणवत्ता सबसे खराब स्तर पर थी? तब कोई आवाज तक नहीं उठी। क्योंकि प्रदूषण कभी समस्या नहीं थी, बल्कि यह एक और देश विरोधी अनुष्ठान का मुखौटा था, जो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और एनडीए सरकार को बदनाम करने की कोशिश से प्रेरित था।


ये लोग न तो पीड़ित नागरिक हैं जो सांस लेने को तरस रहे हैं, न ही वे स्वयं-घोषित “क्रांतिकारी” हैं, जो हर राष्ट्रीय चुनौती को विचारधारात्मक युद्ध का मौका मानते हैं।ये कार्यकर्ता सिर्फ पोस्टर लेकर ही नहीं, बल्कि अधिकार की अनुभूति भी लेकर आते हैं। ये शहरी अभिजात वर्ग हैं जो आधुनिक जीवन की हर सुख-सुविधा का आनंद उठाते हैं, जबकि दूर से गरीबी के प्रेमी भी बनते हैं। ये हाशिए पर स्थित लोगों के लिए ध्यान आकर्षित करने की बात करते हैं, जबकि वे उनके जीवन के यथार्थ से अनजान रहते हैं।
इनके पास वैश्विक ब्रांड्स की पोशाक है और एक अतित्साह समर्थित राजनीति भी है। ये अत्याचार की बातें करते रहते हैं, पर किसी भी जिम्मेदारी से भागते हैं। अगर उनकी प्रतिबद्धता जनजातीय समुदायों के साथ सच्ची होती, तो वे उन इलाकों में कम से कम एक माह बिताते। वे तो बस मेट्रोपॉलिटन विद्रोह का आराम चाहते हैं। आखिर, लोगों का दुःख साझा करने से ज्यादा आसान है सहायता करना। यह पागलपन की मानसिकता अब नए जागरूकता के माहौल को परिभाषित करने लगी है।
एक समय न्याय के लिए लड़ने का दावा करने वाला आंदोलन, जागरूकता अब एक ऐसी शक्ति बन चुका है जो विचारों का निरीक्षण करती है, भाषा को फिर से लिखती है, और विरोध को डरावनी तीव्रता से सजा देती है। यह सहमति की ओर नहीं बल्कि ज़ोर जबरदस्ती की ओर बढ़ रहा है। अब इसका लक्ष्य समानता या न्याय नहीं बल्कि अपनी जिद मनवाना और बदला लेना है। ये जागरूकता कार्यकर्ता बहस नहीं चाहते, बल्कि आज्ञाकारीता चाहते हैं। उनके लिए कोई भी मतभिन्नता विश्वासघात है।
उनका लेबल बदलने की गति देखिए। पिछले साल, ये कार्यकर्त्ता “गिरफ्तारियों” और “फासिस्टों” को कोस रहे थे। अब उनके द्वारा प्रयुक्त अपमान जनम शब्द भी बदले गए हैं: “विश्वासघाती”, “चरमपंथी”, “MAGA समर्थक” इत्यादि। स्टिकर बदलते हैं, लेकिन रणनीति वही रहती है: उन लोगों की आवाज छीनना जो नीचा नजर आते हैं। यह दोमुंहापन भारत तक ही सीमित नहीं है। कनाडा पर भी विचार करें, जहां हाल ही में राष्ट्रवाद फिर से उभरा, लेकिन ट्रंप की टैरिफ का विरोध कर रहा है। वही लोग जो वर्षों कनाडा को एक औपनिवेशिक, नस्लवादी राष्ट्र कहकर मख़्याली बनाते थे, अचानक अपने राजनीति के लिए राष्ट्रीय झंडा ओढ़ लेते हैं।
उनके लिए राष्ट्रवाद एक ऐसा वेश है जो अवसर मिलने पर पहना और उतारा जाता है। इसका विरोधाभास उन्हें परेशान नहीं करते क्योंकि स्थिरता कभी उनका मकसद नहीं रही, बल्कि उनका लक्ष्य नैतिक श्रेष्ठता का भ्रम बनाये रखना है।यह उनकी संस्थायें भी हैं, जहां नए धर्मगुरु उभर रहे हैं, जो नैतिक मीनिंग को सभ्य बहस के बजाय सड़कछाप संवाद में तलाशते हैं। कई विश्वविद्यालय अब उनके अध्यस्थल बन चुके हैं, जहां परंपरागत निष्कर्ष विद्वता का रूप लेते हैं और उन पर सवाल करने वालों को अनुशासनात्मक कदमों का सामना करना पड़ता है।
इन संस्थानों में विचार विकसित होने की बजाय, स्वीकृति का माहौल पनपता है। महान दार्शनिक बर्ट्रेंड रसेल ने कहा था कि कुछ लोग सोचने से बेहतर मरना पसंद करते हैं, और आज के कार्यकर्ता शायद सोचने का प्रयास भी नहीं करना चाहते।सबसे आश्चर्यजनक बात इस जागरूकता के माहौल का अपना विरोध है, वह भी सार्वजनिक व्यवस्था के प्रति। यह तोडफ़ोड़ को प्रतिरोध मानते हैं, घृणा संदेश को अभिव्यक्ति, और सड़कों पर धमकियों को नागरिक कर्तव्य समझते हैं। किस दुनिया में कार की खरोंच, आस्था के प्रतीकों से दुर्व्यवहार, शहर के रास्ते अवरुद्ध करना, मूर्तियों का तोड़फोड़ या विरोधियों को धमकाना राजनीतिक उत्कृष्टता का मापदंड बन जाता है? विरोध ही लोकतंत्र में स्थान रखता है, न कि विनाश।
एक सक्रिय समाज के लिए यह जरूरी है कि मतभिन्नता संस्थान, बातचीत, कानूनों के माध्यम से हल हो। जब एक्टिविज्म अपराध की अनुमति बन जाए, तो वह एक्टिविज्म नहीं रह जाता है। यह एक तरीके से लोकतांत्रिक चुनावी नेता मोदी को भगाने का भी एक रास्ता है, जिसे वे वोट के माध्यम से नहीं हरा सके। उनके लिए अंतिम उद्देश्य ही जरूरी है, और इसके लिए नैतिकता का कोई स्थान नहीं है।भारत भी, कई लोकतंत्रों की तरह, अब एक विकल्प का सामना कर रहा है। हम एक छोटी और गलत इरादे वाली भीड़ को भाषा, पुलिसिंग, संस्कृति और सार्वजनिक व्यवहार तय करने का अवसर दे सकते हैं, या फिर हम मूल सिद्धांतों, जैसे कि भिन्न मान्यताओं का सम्मान, गलतियों की जवाबदेही, और हिंसा को राजनैतिक अभिव्यक्ति के रूप में सामान्य बनाने से इनकार कर सकते हैं।
जागरूकता का माहौल, जो नैतिक धमकी पर पलता है, तभी तक चलता है जब तक लोग उसकी विरोधाभासों को उजागर न करें। पर जब उसे उजागर किया जाए, तो उसकी नाटकीयता स्पष्ट हो जाती है: यह एक नैतिक अभिनय है जिसकी कोई जिम्मेदारी नहीं है। दुनिया की सबसे पुरानी लोकतंत्र होने के नाते, हमें अलग-अलग विचार और संवाद का स्थान देना चाहिए, पर ऐसे धोखेबाजों को नहीं, जो अराजकता की कोशिश करते हैं।
सच्चे लोकतंत्र और न्याय के लिए साहस और स्पष्टता जरूरी है, न कि तोड़फोड़ और चुनिंदा विरोध। अब वक्त है वोक की झूठी और नाटकीय धारणाओं का साफ-साफ और जोरदार पर्दाफाश करने का।


