मुंबई वार्ता संवाददाता

प्रयागराज के संगम तट पर महाकुंभ में देशभर के संतों का समागम हुआ है। इसी महाकुंभ में ‘सनातन बोर्ड’ की मांग भी जोरों पर है। विख्यात कथाकार श्रद्धेय ‘शांतिदूत’ देवकीनंदन ठाकुरजी महाराज इस मांग को लेकर सबसे ज्यादा सक्रिय हैं।
उन्होंने प्रतिष्ठित साधु-संतों के साथ महाकुंभ में ‘सनातन धर्म संसद’ का विशाल आयोजन किया। उनके साथ संतों-महंतों, धर्माचार्यों, मठाधीशों, जगद्गुरुओं, महामंडलेश्वरों व अखाड़ा परिषद के प्रमुखों ने ‘सनातन बोर्ड’ के लिए एक प्रारूप पारित किया और उस पर हस्ताक्षर किए। इसे प्रधानमंत्री को सुपुर्द किया जाएगा।
फिल्म अभिनेत्री व मथुरा की सांसद हेमा मालिनी ने भी इस आयोजन में भाग लिया और संतों का पुरजोर समर्थन किया। ‘सनातन बोर्ड’ की इस मांग पर संतजन केंद्र सरकार की दखल चाहते हैं। देवकीनंदन ठाकुर महाराज लंबे समय से मंदिरों के साथ ही सनातन संस्कृति और सनातनियों के अधिकारों के लिए प्रयत्नशील हैं। वे भारत की मूल संस्कृति, परंपराओं और रीति रिवाजों आदि की सीख के साथ वैदिक शिक्षा देने पर भी जोर देते आए हैं।
उनका कहना है कि प्रमुख मंदिरों को सरकारी नियंत्रण से मुक्त करके सनातन बोर्ड के माध्यम से संचालित किया जाए। वहां वैदिक पद्धति का पालन हो। मंदिरों की प्रशासनिक व्यवस्था सनातन बोर्ड संभाले। उनसे प्राप्त धन सरकार न ले जाए। उसका उपयोग सनातन संस्कृति के विकास के लिए खर्च किया जाए। देशभर में गौशाला, औषधालय, गुरुकुलम् की स्थापना की जाए। सनातन बोर्ड के गठन की चर्चा दरअसल देश में वह वक्फ बोर्ड की मौजूदगी से कुछ ज्यादा ही गर्म है। ‘सनातन बोर्ड’ कब, कैसे बनेगा? यह सरकार पर निर्भर है। प्रस्तावित सनातन बोर्ड में शंकराचार्यो, जगद्गुरूओं, अखाड़ों, धर्माचार्यों, हिंदु संगठनों, प्रमुख मंदिरों ,गौसेवकों, गुरूकुलों व सनातन से जुड़े अनेक लोगों को शामिल करने की बात कही गई है। कुछ ने कहा कि ठाकुरजी महाराज सनातन बोर्ड की अगुवाई करना चाहते हैं। इसी बात ने देवकीनंदन महाराज को बहुत पीड़ा पहुंचाई।
उन्होंने स्पष्ट किया कि उन्हें किसी पद की लालसा नहीं है। उन्होंने अपना एक शपथपत्र श्रीजी के चरणों में रखा और कहा कि मैं भविष्य में कभी कोई पद ग्रहण नहीं करना चाहूंगा। साधु-संतों ने ‘सनातन बोर्ड’ की मांग करने की देवकीनंदन ठाकुर महाराज की पहल को खुलकर समर्थन दिया है। इतना ही नहीं ‘शांतिदूत’ के रूप में लोकप्रिय देवकीनंदन ठाकुर महाराज को सभी संतों ने ‘क्रांतिदूत’ संबोधित कर नया सम्मान दिया। परंतु आरंभ में ही देवकीनंदन महाराज ने मंच पर एकाएक क्रंदन कर माहौल को भावुक कर दिया। वे इस आरोप से पीड़ित थे कि वे सनातन बोर्ड का अध्यक्ष बनना चाहते हैं। इसका खंडन करते हुए उनकी आंखें सजल हो उठीं।
दिग्गज संतों से सजे-धजे ‘सनातन धर्म संसद’ के विशाल मंच पर वे फफक-फफक कर रोने लगे। उनकी अश्रुधाराएं जगद्गुरू निम्बार्काचार्य श्रीजी के चरणों में पहुंचकर ही थमीं। कोई पद पद न लेने का शपथ पत्र सौंपते समय उनकी आंखें सजल हो गईं और वे फूट-फूट कर रोने लगे। उन्होंने स्पष्ट किया कि वे केवल सनातन और आगे आने वाली पीढ़ी की रक्षा के लिए यह सब कुछ कर रहे हैं। उनका मन निर्मल है। उनका उद्देश्य स्पष्ट है और उनके मन में कोई लालच या लालसा नहीं है। देवकीनंदन का यह क्रंदन संकेत है कि सनातनी अपनी संस्कृति को संभालें वर्ना आने वाली पीढ़ियों को क्रंदन करना पड़ेगा। उन्होंने सनातन की क्रांति का आगाज कर दिया है। तभी तो वे ‘शांतिदूत’ से ‘क्रांतिदूत’ बन गए हैं।


