डाॅ धीरज फूलमती सिंह /स्तंभकार/मुंबई वार्ता

अजय देवगन की फिल्म “दृश्यम” याद है ? आप “चंद्रवीर गाजियाबाद केस” याद किजिए! साल 2018 में ‘चंद्रवीर गाजियाबाद केस’ में अपराधी ने 2015 में आयी अजय देवगन अभिनीत फिल्म ‘दृश्यम’ को देखकर इस भीषण हत्याकांड को अंजाम दिया था। आश्चर्य की बात यह है कि चार वर्ष बाद 2022 में इस हत्याकांड का पर्दाफाश हुआ था।
नोएडा का निठारी हत्याकांड याद आ रहा है ? अपने ढंग का यह अनूठा केस है। साल 2005 और 2006 में नोएडा के पास निठारी गाँव में कई बच्चो के बलात्कार और सीरीयल मर्डर हुए थे। इसमे दो अभियुक्त भी धरे गये थे,निचली और सीबीआई अदालत ने उनको फांसी की सजा दी थी लेकिन बिडम्बना देखिए कि हाईकोर्ट ने सुबूतों के अभाव में उनको बरी कर दिया। इस केस पर हाल ही में एक फिल्म बनाई गई थी, “सेक्टर 36!” जब कि ऐसा कहा जाता है कि निठारी हत्याकांड राम से बंधु की फिल्म “सामरी” और “दरवाजा” से प्रेरित थी! आज कल बलात्कार के झूठे केस बहुत से दर्ज होने लगे है।


महिलाओ द्वारा बलात्कार के नाम पर ब्लेकमेल करना आम बात सी हो गई है। आये दिन ऐसे वाक्ये समाचारो की सुर्खिया बनाए जाते है। एक अनुमान के मुताबिक भारत में 73% बलात्कार के झूठे केस दर्ज किए जाते है। जिसकी परिणिति भविष्य में अदालत के बाहर समझौते या साक्ष्यों के अभाव में खत्म हो जाते है। आप को पता है,ऐसी सभी प्रेरणायें कहां से मिलती है ? अधिकांश मामलों में इन बलात्कार के झूठे केसो के जिम्मेदार फिल्मो के वे दृश्य होते है,जिनमें नायिका या महिला पात्र अपनी साडी,कपडे फाड कर पुरुष पात्र को डराती, धमकाती है।
कुछ मामलों में आधुनिक खोखली महिलाओ के लिए ऐसा कुछ करना अपना जीवन निर्वाह का साधन भी होता है। भटकी और बिगड़ैल घर की लडकियां ऐसे दृश्यों से प्रोत्साहित होती है।
भारत में दुनिया की कुल 12% आबादी रहती है जो धुम्रपान करती है,इसका सीधा मतलब है कि भारत की कुल 28.6% जनसंख्या धुम्रपान में संलिप्त है। जिसकी वजह से भारत में हर साल 10 लाख से ज्यादा लोगों मर जाते है। एक खुशी की बात है कि भारत में शराब पीनें वालों का प्रतिशत 29.4 से घटकर 24% के करीब आ गया है। इसके पीछे सरकार का शराब विरोधी विज्ञापन और लोगो की जागरूकता है लेकिन इसके पीछे एक स्याह पहलू भी यह है कि भारत के युवा धुम्रपान और मद्यपान भी फिल्मों के पात्रों से प्रेरित होकर ही शुरु करते है।
भारतीय फिल्मो में नायक और खलनायक के पात्र हमेशा से भारतीय युवाओ को सिगरेट और शराब पीने के लिए प्रोत्साहित करते रहे है। संवैधानिक रूप से देखा जाए तो लडकी से साथ अश्लील हरकत या छेडछाड करना अपराध की श्रेणी आता है,पुलिस भी ऐसी घटनाओ का संज्ञान बहुत जल्दी लेते हुए त्वरित कार्रवाई करती है मगर आप ने महसूस किया होगा कि आज कल युवाओ में छेडछाड करना कूल लगने की निशानी है।
युवा एक दूसरे को लडकियों से छेडछाड करने को प्रेरित करते रहते है। इस के पीछे एक ही कारण है कि भारतीय फिल्मो में नायक द्वारा नायिका से छेडछाड करना नायिका के दिल में प्रेम की कोपल फोड देता है। छेडछाड के बाद नायिका,नायक से प्रेम करने लगती है। ऐसे दृश्य यौवन की दहलीज पर खडे युवाओ को प्रेरित,उत्साहित और प्रोत्साहित करते है। फिल्म बंटी और बबली में अभिषेक बच्चन और रानी मुखर्जी हैं, जो लोगों से पैसे लूटने के लिए उन्हें बेवकूफ बनाने की कोशिश करते हैं और उस पैसे के साथ एक शानदार जीवन जीते हैं। आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि बहुत सारे जोड़ों ने वास्तविक जीवन में इस तरह के लूट को करने की कोशिश की। दिल्ली में एक जोड़े को 2013 में लोगों को लूटने और फिर भागने के आरोप में गिरफ्तार किया गया था। उन्होंने फिल्म बंटी और बबली के बारे में स्पष्ट रूप से बताया था।
नीरज पांडे द्वारा निर्देशित फिल्म स्पेशल 26 में अक्षय कुमार मुख्य भूमिका में हैं। यह फिल्म वर्ष 1987 की एक वास्तविक जीवन की घटना को दर्शाती है, जहां नकली सीबीआई अधिकारियों ने एक व्यापारी के साथ मारपीट की और 35 लाख रुपये छीन लिए। 2013 में फिल्म रिलीज के बाद, लोगों के नकली अधिकारी बनने और व्यवसायियों पर छापे मारने के ऐसे मामले सामने आए। ऐसा ही एक मामला मुंबई में दर्ज किया गया जहां छापे पड़े और 21 लाख रुपये लूटे गए।फिल्म धूम में एक दृश्य है,जहां जॉन अब्राहम और उनके गिरोह ने पैसे लूटने के लिए कसीनो की दीवार में एक छेद बनाया। इस से मिलता जुलता केरल में भी इसी तरह की चोरी की सूचना मिली थी, जहां एक गिरोह ने एक शोरूम की दीवार में एक छेद बनाने की कोशिश की थी। बदमाशों ने आठ करोड़ रुपये लूटे थे। उन्होने ने स्वीकार किया था कि धूम फिल्म से उन्हे यह प्रेरणा मिली थी।
फिल्म शूटआउट एट लोखंडवाला से प्रभावित,इसी तरह का एक मामला मेरठ में देखा गया जहां एक 15 वर्षीय लड़के ने अपने दोस्त का अपहरण कर लिया और उसे रिहा करने के लिए 50 हजार रुपये की मांग की। पकड़े जाने के बाद, उसने स्वीकार किया कि वह फिल्म से प्रेरित था।देखा जाए तो आम तौर पर ऐसी मान्यता है कि फिल्मे समाज का आईना होती है,फिल्मो में वही दिखाया जाता है जो समाज में घटित होता है,जबकि होता बिल्कुल इसके उलट ही है,समाज प्रभावित करे ना करे लेकिन फिल्मे समाज को जरूर प्रभावित करती है। मैं कहूंगा कि समाज दरअसल बेहद जटिल संरचना है और उससे भी अधिक जटिल है,समाज को बनाए रखने वाले मनुष्य की मनोवृत्तियों को समझना, इस कारण इस बात पर ज़ोर देने का प्रयास किया गया है कि सिनेमा जगत को इन बातों पर खासा गौर करना चाहिए कि उससे समाज कितना और किस प्रकार प्रभावित और परिवर्तित होता है क्योंकि जिन दो वस्तुओं का अंतर्संबंध जब इतना गहरा होता है तो परस्पर सकारात्मक या नकारात्मक विचारों का आवागमन तो होता ही है।
कुछ फिल्में हिंसा, क्रूरता और उत्तेजना को प्रमोट कर सकती हैं, जिससे विशेष रूप से नए या असमय में परिस्थितियों में ज्यादा तनाव हो सकता है। आज कल ऐसी फिल्मो का दौर सा चल पडा है। सोशल मिडिया पर आये दिन ऐसी फिल्मो की बहुत चर्चा होती है और खूब घमासान भी होता है। एक चिंता जनक बात यह है कि आजकल कि कुछ फिल्मो ने देश और समाज की एकता अखंडता को प्रभावित किया है। देश और समाज को बांटने का काम किया है तो कुछ मामलों में आईना दिखाने,झूठे इतिहास की पर्तें उधेडने और जागरूक करने का भी काम अंजाम देती है। कोई माने या ना माने लेकिन कारण चाहे जो भी हो,सिनेमा एक गतिशील शक्ति है जो समाज को बहुत गहराई तक प्रभावित करता है।


