● कल तक सम्मान, आज ध्रुवीकरण का हथियार
मुंबई वार्ता संवाददाता

टिपू सुलतान के नाम का विरोध कर रही भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) पर दोगलापन और राजनीतिक ध्रुवीकरण के लिए इतिहास के चयनात्मक इस्तेमाल का आरोप लगाया जा रहा है। सामने आए पुराने प्रस्तावों और घटनाओं से स्पष्ट होता है कि जिस नाम का आज विरोध किया जा रहा है, उसी को अतीत में बीजेपी नेताओं और जनप्रतिनिधियों ने न सिर्फ स्वीकार किया बल्कि सम्मान भी दिया। कॉंग्रेस नेता सचिन सावंत ने यह आरोप लगाया है।


उन्होंने कहा कि निम्नलिखित कई उदाहरण भी मौजूद हैं जैसे:-
● उदाहरण 1: अकोला (2012)2012 में अकोला महानगरपालिका की स्थायी समिति सभागृह का नाम “शहीदे वतन शेर-ए-मैसूर टीपू सुल्तान ” रखने का प्रस्ताव स्वयं बीजेपी की ओर से रखा गया था। यह प्रस्ताव तत्कालीन महापौर और वर्तमान में बीजेपी के अकोला महानगर चुनाव प्रमुख विजय अग्रवाल द्वारा प्रस्तुत किया गया।
● उदाहरण 2: मुंबई (2013)मुंबई के एम/पूर्व वार्ड में एक सड़क को “शहीद टिपू सुलतान मार्ग” नाम देने के प्रस्ताव पर बीजेपी के नगरसेवक मौजूद रहे और समर्थन भी मिला। उस समय की महापौर रितु तावडे का नाम भी इस प्रक्रिया से जुड़ा रहा।
● उदाहरण 3: अंधेरी पश्चिम (2001)अंधेरी (पश्चिम) में “शेर-ए-मैसूर टिपू सुलतान मार्ग” के नामकरण का प्रस्ताव बीजेपी के तत्कालीन सांसद गोपाल शेट्टी की उपस्थिति में और बीजेपी नगरसेवकों की मौजूदगी में सर्वसम्मति से पारित किया गया।
● उदाहरण 4: कर्नाटकबीजेपी के वरिष्ठ नेता और कर्नाटक के पूर्व मुख्यमंत्री बीएस येदियुरप्पा ने भी अतीत में टिपू सुलतान की कब्र पर जाकर विजिटर बुक में प्रशंसात्मक टिप्पणी दर्ज की थी।
● उदाहरण 5: विधान सभा (2017)2017 में कर्नाटक विधानसभा में तत्कालीन राष्ट्रपति राम नाथ कोविद ने भी टिपू सुलतान के योगदान का उल्लेख करते हुए प्रशंसा की थी।
सचिन सावंत ने आगे कहा कि तमाम उदाहरणों से यह सवाल उठ रहा है कि जिस ऐतिहासिक व्यक्तित्व को कभी सम्मान दिया गया, आज वही ध्रुवीकरण की राजनीति के तहत विवाद का विषय क्यों बनाया जा रहा है।आलोचकों का कहना है कि यह इतिहास नहीं, बल्कि राजनीतिक एजेंडे के अनुसार बदला हुआ रवैया है।
उल्लेखनीय है कि इतिहासकारों के अनुसार टिपू सुलतान भगवान श्रीराम के नाम वाली अंगूठी भी धारण करते थे, जो उनके व्यक्तित्व के बहुआयामी पक्ष को दर्शाता है।


