मुंबई वार्ता/श्रीश उपाध्याय

बढ़ती महंगाई के मुद्दे को लेकर राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (शरदचंद्र पवार) ने बुधवार को मुंबई के छत्रपति शिवाजी महाराज टर्मिनस (CSMT) परिसर में सरकार के खिलाफ जोरदार प्रदर्शन किया। पार्टी की राष्ट्रीय कार्याध्यक्ष और सांसद सुप्रिया सुले के नेतृत्व में हुए आंदोलन में मुंबई के पदाधिकारी और बड़ी संख्या में कार्यकर्ता शामिल हुए। कार्यकर्ताओं ने ‘महंगाई की मार नहीं चलेगी’ जैसे नारे लगाकर सरकार के खिलाफ विरोध जताया। कुछ कार्यकर्ताओं ने गले में सब्जियों और अनाज की माला पहनकर बढ़ती महंगाई की ओर ध्यान आकर्षित किया।


प्रदर्शन के दौरान मीडिया से बातचीत में सुप्रिया सुले ने कहा कि घर जाकर अपनी मां, बहन और पत्नी से पूछिए कि कितनी महंगाई बढ़ गई है। सब्जी, अनाज, दूध, चीनी जैसी रोजमर्रा की जरूरत की वस्तुओं के बढ़ते दामों का सीधा असर आम लोगों पर पड़ रहा है। आवश्यक वस्तुओं की कीमतें बढ़ने से आम परिवारों का घरेलू बजट बिगड़ गया है। उन्होंने सरकार से महंगाई पर नियंत्रण के लिए ठोस कदम उठाने की मांग की।
■ ‘सरकारी आंकड़े और घर के खर्च में अंतर’
सुप्रिया सुले ने कहा कि सरकारी आंकड़ों और आम परिवारों के वास्तविक खर्च में अंतर दिखाई देता है। फूड इन्फ्लेशन कितना है, यह भी बड़ा सवाल है। सुबह के नाश्ते से लेकर रोजाना के भोजन तक महंगाई का असर महसूस किया जा रहा है। दूध जैसी बुनियादी जरूरत की वस्तु के दाम भी बढ़े हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार की नीतियों के कारण सामान्य आदमी की कमर टूट रही है।
■ ‘चुनाव के बाद योजनाओं का क्या हुआ?’
सुले ने कहा कि चुनाव के दौरान विभिन्न योजनाओं और रियायतों की चर्चा होती है, लेकिन चुनाव खत्म होने के बाद उनके क्रियान्वयन और निरंतरता पर सवाल खड़े होते हैं। उन्होंने कहा कि ‘आनंदाचा शिधा’ योजना से गरीब और जरूरतमंद परिवारों को कुछ राहत मिलती थी, लेकिन अब यह योजना पहले जैसी दिखाई नहीं देती। उनके अनुसार चुनाव के बाद बड़ी संख्या में महिलाओं के नाम योजना से हटाए गए हैं, जिससे उन्हें आर्थिक कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है।
■ महंगाई का असर किसानों पर भी
सुप्रिया सुले ने कहा कि महंगाई का मुद्दा केवल शहरों तक सीमित नहीं है, बल्कि ग्रामीण क्षेत्रों के किसानों पर भी इसका गंभीर असर पड़ रहा है। किसान कर्ज के बोझ में दब रहे हैं और आत्महत्या जैसी गंभीर घटनाएं सामने आ रही हैं। उन्होंने कहा कि सरकार ने कर्जमाफी को लेकर बड़े दावे किए, लेकिन यह देखना होगा कि वास्तव में अन्न पैदा करने वाले किसान को कितना न्याय मिला।
उन्होंने कहा कि जो किसान मेहनत कर देश के लिए अन्न पैदा करता है, उसे न्याय मिलना चाहिए। शहरों में काम करने के लिए आने वाले लोगों को भी रोजाना महंगाई का सामना करना पड़ रहा है। ऐसे में महंगाई का असर ग्रामीण और शहरी, दोनों क्षेत्रों के नागरिकों के जीवन पर पड़ रहा है।
■ ‘हर मतदाता मतदाता सूची में अपना नाम जांचे’
सुप्रिया सुले ने नागरिकों से मतदाता सूची में अपना नाम जांचने की अपील भी की। उन्होंने कहा कि डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर ने संविधान के माध्यम से हर नागरिक को एक वोट का अधिकार दिया है और इस अधिकार को गंवाना नहीं चाहिए। यदि नाम दो बार दर्ज है तो उचित सुधार कराया जाए और यदि नाम मतदाता सूची से गायब है तो तत्काल आवश्यक प्रक्रिया पूरी कराई जाए।
■ मराठा, OBC और आदिवासी आंदोलनों का भी जिक्र
सुले ने कहा कि मराठा समाज, OBC, आदिवासी, महिलाओं और आश्रम स्कूलों के विद्यार्थियों सहित विभिन्न वर्गों को अपनी मांगों के लिए आंदोलन करना पड़ रहा है। उन्होंने इसे दुर्भाग्यपूर्ण बताते हुए कहा कि नागरिकों को अपनी मांगें सरकार तक पहुंचाने के लिए बार-बार सड़कों पर उतरना पड़ रहा है। उन्होंने आरोप लगाया कि जब तक आंदोलन तेज नहीं होता, तब तक सरकार जागती नहीं है।
■ GDP बढ़ने के दावे पर भी सवाल
उन्होंने कहा कि सरकार की ओर से अर्थव्यवस्था मजबूत होने की बात कही जाती है, लेकिन कुछ अर्थशास्त्रियों और पूर्व RBI गवर्नरों की राय पर भी ध्यान दिया जाना चाहिए। GDP की विकास दर और आम नागरिक के घर की आर्थिक स्थिति में अंतर है। इसलिए केवल आर्थिक वृद्धि के आंकड़ों पर ध्यान देने के बजाय आम लोगों के वास्तविक जीवन की परिस्थितियों पर भी विचार किया जाना चाहिए।
■ शांतिपूर्ण प्रदर्शन करने वाले छात्रों के अधिकारों का सम्मान हो
सुप्रिया सुले ने शांतिपूर्ण आंदोलन कर रहे विद्यार्थियों के अधिकारों का सम्मान करने की मांग की। उन्होंने कहा कि बच्चे शांतिपूर्वक बैठकर गाने गा रहे थे और न्याय की मांग कर रहे थे, इसमें उनकी क्या गलती है। संविधान ने उन्हें शांतिपूर्ण तरीके से आंदोलन करने का अधिकार दिया है और यह अधिकार किसी से नहीं छीना जाना चाहिए।
■ ‘हमारी बात नहीं सुनी जाएगी तो यह कैसी लोकतंत्र व्यवस्था?’
अपने दल से जुड़े एक मामले की सुनवाई बार-बार टलने का मुद्दा उठाते हुए सुले ने नाराजगी जताई। उन्होंने कहा कि कई बार मामले को बोर्ड पर लेने की मांग करने के बावजूद अभी तक तारीख नहीं मिल रही है। उन्होंने सवाल उठाया कि अगर लोकतंत्र में हमारी बात सुनी ही नहीं जाएगी तो यह कैसा न्याय और कैसी लोकतांत्रिक व्यवस्था है?


