कौशल विनोद पाठक/मुंबई वार्ता/लेखक

देश की शिक्षा व्यवस्था इस समय एक गहरे संकट के दौर से गुजर रही है। विश्वविद्यालयों की स्वायत्तता, शिक्षकों की गरिमा, छात्रों का भविष्य और लोकतांत्रिक मूल्यों पर सीधा प्रहार करने वाला UGC क़ानून आज एक काले क़ानून के रूप में सामने खड़ा है। यह कोई सामान्य प्रशासनिक सुधार नहीं, बल्कि शिक्षा को केंद्रीकरण, नियंत्रण और बाज़ारीकरण की ओर धकेलने की साज़िश प्रतीत होता है।


■ विश्वविद्यालयों की स्वायत्तता पर सीधा हमला
UGC क़ानून के ज़रिये केंद्र सरकार को यह अधिकार दे दिया गया है कि वह विश्वविद्यालयों के पाठ्यक्रम, नियुक्ति, परीक्षा प्रणाली और प्रशासनिक ढांचे में सीधा हस्तक्षेप कर सके। यह संघीय ढांचे और अकादमिक स्वतंत्रता दोनों के लिए घातक है।विश्वविद्यालय ज्ञान के मंदिर होते हैं, न कि सत्ता के आदेश पालन केंद्र।
■ शिक्षकों को संविदा मज़दूर बनाने की साज़िश
इस क़ानून का सबसे खतरनाक पहलू यह है कि यह स्थायी शिक्षकों की व्यवस्था को समाप्त कर संविदा और अल्पकालिक नियुक्तियों को बढ़ावा देता है।इससे:शिक्षकों की आज़ादी छिन जाएगीशोध और नवाचार दम तोड़ देंगेशिक्षक सत्ता और प्रबंधन के दबाव में काम करने को मजबूर होंगेयह शिक्षा नहीं, बल्कि बौद्धिक दासता की नींव है।
■ छात्रों का भविष्य अंधकारमय
UGC क़ानून शिक्षा को धीरे-धीरे मुनाफ़े का साधन बना रहा है। निजीकरण को खुली छूट, फीस वृद्धि और डिग्री के बाज़ारीकरण सेगरीब और मध्यम वर्ग के छात्र बाहर होंगेशिक्षा अधिकार नहीं, विशेषाधिकार बन जाएगीक्या यही लोकतांत्रिक भारत का सपना था?
■ लोकतंत्र बनाम तानाशाही मानसिकता
यह क़ानून बिना व्यापक चर्चा, बिना शिक्षाविदों की सहमति और बिना छात्र-शिक्षक संगठनों की राय के थोपा गया।यह दर्शाता है कि निर्णय जनहित में नहीं, सत्ता हित में लिए जा रहे हैं।अब चुप रहना अपराध होगा। यदि आज UGC क़ानून का विरोध नहीं किया गया, तो कल विश्वविद्यालय सरकारी दफ़्तर बन जाएंगे, शिक्षक आदेशपालक होंगे, छात्र उपभोक्ता, इसलिए यह केवल शिक्षा का नहीं, लोकतंत्र बचाने का संघर्ष है।
■ देशव्यापी विरोध ही एकमात्र रास्ता
छात्रों, शिक्षकों, अभिभावकों, बुद्धिजीवियों और सामाजिक संगठनों को एकजुट होकर कहना होगा—“यह काला UGC क़ानून हमें मंज़ूर नहीं!”यह लड़ाई किसी दल की नहीं, देश के भविष्य की है।”


