देखिए धर्म हाथी है। जबकि विज्ञान उसके आगे एक चींटी है:- सद्गुरु आचार्य श्री लोकेशानन्द जी महाराज।

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मुंबई वार्ता /राजेश विक्रांत

पत्रकारों से बात करते हुए सद्गुरु श्री लोकेशानन्द जी महाराज ने कहा कि,” धर्म हाथी है। जबकि विज्ञान उसके आगे एक चींटी है।” सद्गुरु श्री लोकेशानन्द जी महाराज की विशेषता है कि वे आपके सवालों को पहले से ही जान लेते हैं। आश्चर्य की बात है कि कोई भी श्रद्धालू उनसे कोई प्रश्न पूछे, इससे पहले ही उनको प्रश्नों का ज्ञान हो जाता है।

सद्गुरु श्री लोकेशानन्द जी महाराज श्री नारायण भक्ति पंथ-एस एन बी पी के प्रवर्तक हैं तथा श्री मंदिर श्री नारायण पुरम तीर्थ, शहादा, जिला नंदुरबार, महाराष्ट्र के प्रेरक हैं। वह ईश्वर के मूल स्वरूप भगवान श्री नारायण अर्थात विष्णु भगवान के परम पुजारी हैं। श्री लोकेशानन्द जी महाराज की प्रेरणा से श्री विष्णु को समर्पित पक्षीराज श्री गरुड़ प्रासाद को अर्वाचीन विश्व में प्रथम बार शहादा धाम में मूर्ति स्वरूप दिया जा रहा है।

सद्गुरु आचार्य श्री लोकेशानन्द जी महाराज ने पत्रकारों से विस्तृत बातचीत की । प्रस्तुत हैं उस बातचीत के महत्वपूर्ण अंश:-

प्रश्न:- आज के युग में विज्ञान, तकनीक, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, इंटरनेट आज की प्रमुख भूमिका है तो इस युग में धर्म और आध्यात्मिकता की क्या प्रासंगिकता है?

जवाब:- देखिए धर्म हाथी है। जबकि विज्ञान उसके आगे एक चींटी है। धर्म अध्यात्म ने जितनी भी तरक्की की है, धर्म शास्त्रों में जो लिखा गया है, विज्ञान आज तक वहां पहुंच नहीं पाया है। उदाहरण के लिए विज्ञान रक्त नहीं बन सकता। विज्ञान आज तक शहद की एक बूंद नहीं बन पाया। विज्ञान ने शहद की डुप्लीकेटिंग में शरबत बनाया, जिसकी एक एक्सपायरी डेट होती है कि इसके बाद से इसका उपयोग नहीं कर सकते। लेकिन आपने सुना होगा कि किसी देश में साढे 5000 साल पुराना शहद मिला है और वह आज तक एकदम सही और शुद्ध रूप में है। मेरे कहने का मतलब यह है कि जो ईश्वर ने बनाया है वह चिरकाल तक वैसा का वैसा ही रहेगा। वह कभी खराब नहीं होगा। जैसे हमारी आंख के अंदर, एक आंख के अंदर 27 करोड़ सेल्स- कोशिकाएं होती हैं। इन्हें साइंस ने बनाया क्या? इन्हें किस साइंटिस्ट ने वहां फिट किया? किसी ने नहीं! तो कहने का मतलब यह है कि हर चीज को विज्ञान के नजरिए से नहीं देखा जाना चाहिए। धर्म को भाव से देखो। अब यह जो सूर्य ग्रहण होता है इस ग्रहण के समय मैंने एक अखबार में इंटरव्यू दिया था कि गर्भवती महिलाओं को ग्रहण के समय बाहर नहीं निकलना चाहिए। उसकी छाया उनके लिए घातक हो सकती है। तो एक साइंटिस्ट ने मेरी बातों पर आपत्ति उठाई। मैंने दैनिक भास्कर के संस्थापक रमेश चंद्र अग्रवाल जी से कहा कि उस साइंटिस्ट से मेरी मुलाकात का प्रबंध करवाइए। अग्रवाल जी ने पुणे में मेरी मुलाकात उस साइंटिस्ट महोदय से करवाई। उस मुलाकात में मैंने साइंटिस्ट जी से कहा कि आप सभी चीजों को विज्ञान के नजरिए से देखते हैं। सूर्य हाइड्रोजन का गोला है। उसका प्रकाश बीच में आ गया। मेरा आपसे कहना यह है कि अगर मैं आपको थप्पड़ मारूं तो आपको लगेगा क्या? उन्होंने कहा कि क्यों नहीं लगेगा! मैंने कहा अरे भाई आप इस बात को साइंस की नजर से देखिए, यह चमड़ी है और मेरी चमड़ी आपकी हड्डी से टकरा गई बस। इसमें बुरा मानने की क्या बात है? तब वे साइंटिस्ट महोदय निरुत्तर हो गए। तो कहने का मतलब यह है धर्म हाथी है जबकि विज्ञान उसके सामने एक चींटी ही है। उदाहरण के तौर पर मैं कहना चाहूंगा कि ईश्वर ने पक्षी बनाया। विज्ञान ने उसे देखकर हवाई जहाज बनाया , तो यह प्रकृति का एक खेल है और विज्ञान ने प्रकृति प्रदत्त ईश्वर प्रदत्त चीजों को मॉडिफाई करके अपनी सुविधा के अनुसार प्रयोग किया है।

प्रश्न:- सत्यनारायण की पूजा एकल रूप है या युगल रूप?

जवाब:- मेरा कहना यह है कि जब आप भगवान श्री नारायण की पूजा करते हैं तो उसमें लक्ष्मी जी रहती ही है। हमारे लिए महत्वपूर्ण है कि हम धर्म का, पूजा का, भक्ति का, आराधना का एक रास्ता पकड़ें और चलते रहें। नारायण में सब आ ही जाता है।

सवाल: – कोई कहता है कि अकेले नाम लो, कोई कहता युगल में नाम लो, जैसे राधा कृष्ण ,राधेश्याम, राम सीता आदि। हम युगल नाम लें या एकल, क्या सही रहेगा?

जवाब:- मेरा कहना है कि नाम नारायण का लेना चाहिए। भक्ति उसी की होती है। अगर आप उनके अवतारों में जाएंगे तो अवतारों की संख्या हजारों में है। यहां यह लीला की थी, वहां यह लीला की था, इनका नाम इस देवी के साथ, इस अवतार का नाम लूं या उस देवी के साथ उस अवतार का। कई लोग कहते हैं कि देवी के साथ नाम लेना चाहिए। तो कुछ का मानना है कि नहीं लेना चाहिए। मेरा कहना है कि यह सब झंझट आप त्याग दीजिए। सनातन धर्म विष्णु भगवान से चलता है। 24 अवतार भी भगवान विष्णु से ही चलते हैं। इसलिए उस नारायण का नाम, श्री विष्णु जी का नाम लीजिए जिनकी जयंती नहीं आती। जिनका कोई जन्मदिन नहीं आता। ओम नमो भगवते वासुदेवाय इसमें वासुदेव श्री नारायण का नाम है। किसी देवी का नाम नहीं। विशुद्ध भगवान की भक्ति कीजिए। श्री नारायण की भक्ति कीजिए।

प्रश्न:- हम पंचदेवों की भक्ति करें या किसी देवता का या किसी देवी का?

जवाब:- पंचदेवों की भक्ति जो की जा रही है या कर रहे हैं वही सनातन है। वही शुद्ध है। उससे नीचे उतरेंगे तो मिलावट शुरू हो जाएगी। पांच देवों में परम इष्ट विष्णु जी हैं। किसी भी देवी देवता की पूजा करते हैं तो हाथ में जल लेकर पहले श्री विष्णु जी का ही नाम बोलते हैं और पूजा के बाद में भी आप श्री नारायण कहते हैं- श्री नारायण समर्पयामि।

प्रश्न:- जाप किया जाए या नाम जप किया जाए। इसको लेकर बहुत सारे लोग कंफ्यूज होते हैं। यह दोनों एक है या अलग-अलग। इनमें से एक को ही करना चाहिए या दोनों को?

जवाब:- देखिए किसी भी क्रिया में थोड़ा सा भी इधर-उधर हुआ तो उसके फल में फर्क आ जाता है। उदाहरण के लिए आपके पास किसी का भी एक मोबाइल नंबर है उसमें 10 डिजिट होते हैं। फोन में सेव करते समय एक भी डिजिट इधर-उधर हुआ तो क्या आपका उस व्यक्ति से संपर्क होगा? बिल्कुल नहीं होगा! रांग नंबर ही लगेगा। इसी तरह से नाम स्मरण अलग है, मंत्र जाप अलग है। मंत्र यानी मंतर , मन को तारता है, मन को अपलिफ्ट करता है। नाम क्लीनिंग करता है, साफ सफाई करता है। जैसे किसी गाड़ी को साफ करना एक अलग चीज है गाड़ी को चलाना एक अलग बात है। तो हम नाम स्मरण करके अपने हृदय को शुद्ध करते हैं और मंत्र जाप हमारे जीवन को तारता है।

प्रश्न:- पूजा के लिए आसन लगाकर बैठना चाहिए या कभी भी करते रहना चाहिए?

जवाब:- बगैर नियम के कुछ नहीं होगा। कोई फल नहीं प्राप्त होगा। जैसे कि आप भोजन करते हैं कोई कहे कि दिनभर खाते रहो तो आप कहोगे कि मैं दो बार बैठकर खाऊंगा तभी तृप्ति मिलेगी। भजन का यही नियम है। भजन भी दिन में काम से कम दो बार बैठकर करना पड़ेगा। या तीन बार। हर चीज का एक नियम होता है तभी फल मिलता है। तभी अच्छे परिणाम मिलते हैं।

प्रश्न:- नए जनरेशन में धर्म के प्रति जिज्ञासा बढ़ाने के लिए क्या उपाय किए जाने चाहिए?

जवाब:- मैं आपकी चिंता को भली-भांति समझता हूं और मैं इस दिशा में प्रयास भी करता हूं । मैं अपना समय विद्यार्थियों को देता हूं । यूथ ओवर ऑल डेवलपमेंट के अंतर्गत एक गांव में पांच 5000 बच्चे हमारे सत्रों में हिस्सा लेते हैं। हम बच्चों को बताते हैं कि जीवन सूत्र आचार संहिता क्या करें क्या न करें? क्या करके हम जीवन में आगे बढ़ सकते हैं? अच्छा काम कर सकते हैं। जैसे मैं एक चीज बार-बार कहता हूं कि तीन गलतियां करने से माँ सरस्वती बुद्धि छोड़ देती है। पहली गलती है उल्टे हाथ से पानी पीना। दूसरी है बार-बार मुंह झूठा करना। यानी कि भोजन का एक नियम होता है। भोजन मतलब तीन बार से ज्यादा होना नहीं चाहिए। एक और गलती है पैर के तलवे को छूना। हम इन सत्रों में नैतिक सूत्र, जीवन सूत्र देते हैं। क्योंकि मेरा मानना है विज्ञान ने धर्म को एक बढ़िया सहयोग दिया है, तो विज्ञान के सहयोग से धर्म का विकास होना चाहिए।

प्रश्न:- देश का भविष्य आप किस रूप में देखते हैं?

जवाब:- देखिए अल्टीमेटली हर देश का अपना प्रारब्ध होता है। लेकिन भारत वर्ष उसमें सबसे अग्रणी और अप्रतिम स्थान पर है। जैसे कि हमारे यहां चार युगों की व्यवस्था बताई गई है। वह सिर्फ भारत में ही है। दूसरी जगह नहीं है। तो उस युग परिवर्तन के अनुसार भारत में आजकल जो भी चल रहा है वह शास्त्रों में लिखा हुआ है और उसका निचोड़ यह है कि भारत का भविष्य उज्जवल है।

मुंबई के वरिष्ठ आरटीआई एक्टिविस्ट अनिल गलगली, वरिष्ठ पत्रकार अभय मिश्र, अजय सिंह, श्रीश उपाध्याय, वरिष्ठ स्तंभकार राजेश विक्रांत, आर के जैन इस अवसर पर उपस्थित थे।

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